शिल्पी की ईमानदारी shilpi ki imandari

शिल्पी की ईमानदारी shilpi ki imandari

राजा को सुदर-सुदर इमारते बनाने का बहुत शौक था. उसके राज्य मे दूर-दूर से कुषल शिल्पिया आकर काम करते थे. राजा उन शिल्पियो का सम्मान भी करता था.

एक दिन राजा के पास एक वृद्ध शिल्पी आया. उसने राजा को प्रणाम करते हुए कहा, ‘महाराज, मैने जीवनभर आपके राज्य की सेवा की है, बड़ी-बड़ी इमारते बनाई है, अब मै बुढ़ा हो गया हूं और अपने गांव जाकर आराम से रहना चाहता हूं.’

राजा ने कहा, ‘तुम महान शिल्पी हो. मै चाहता हूं कि गाव जाने से पहले मेरे लिए एक सुदर भवन बना दो.’

षिल्पी राजा की ख्वाहिश कैसे टाल सकता था. उसने राजा के लिए एक महल बनाना आरम्भ किया, लेकिन उसका मन काम में नहीं लग रहा था.

उसने जैसे-तैसे राजा के लिए महल तैयार कर दिया. काम खत्म होने पर वह राजा के पास गया और गांव जाने की इच्छा जाहिर की. राजा ने कहा,‘मै तुम्हारे काम से बहुत खुश हंू. इसलिए  महल मैं तुम्हंे उपहार स्वरूप दे रहा ह.’

राजा की बात सुनकर शिल्पी बहुत शर्मिदा हुआ, क्योकि उसने पूरी ईमानदारी से काम नहीं किया था.

उस महल मे कई खामिया थी. उसने अपने कार्य के लिए राजा से क्षमा मांगी और उनके लिए एक अद्वितीय महल बनाने मे जुट गया.

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